सामान्य अध्ययन, [10.08.16 19:38]
न्यायाधीशों की नियुक्ति की नयी प्रक्रिया एवं राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (National Judicial Appointment Commission - NJAC):
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A. वर्तमान संवैधानिक उपबंध:
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भारत के संविधान के भाग 5 में अध्याय 4 संघ की न्यायपालिका से सम्बन्धित है और भाग 6 के अध्याय 5 में राज्यों के उच्च न्यायालयों के संबंध में उपबंध हैं. संघ की न्यायपालिका (भाग 5 के अध्याय 4) में अनुच्छेद 124 से अनुच्छेद 147 तक उच्चतम न्यायलय से संबंधित उपबंध हैं. इसी प्रकार राज्यों की न्यायपालिका (भाग 6 के अध्याय 5) में अनुच्छेद 214 से अनुच्छेद 231 तक उच्च न्यायालयों से संबंधित उपबंध हैं.
इनमें से अनुच्छेद 124 में उच्चतम न्यायालय एवं अनुच्छेद 217 में उच्च न्यायालय के मुख्य एवं अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया का उल्लेख है.
अनुच्छेद 124(2) के अनुसार उच्चतम न्यायलय के मुख्य न्यायमूर्ति और अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। इस अनुच्छेद के अनुसार मुख्य न्यायमूर्ति की नियुक्ति करते समय राष्ट्रपति को उच्चतम न्यायालय के और राज्यों के उच्च न्यायालयों के ऐसे अन्य न्यायाधीशों से सलाह लेना होता है जिनसे सलाह लेना वह उचित समझता है। परन्तु मुख्य न्यायमूर्ति के अतिरिक्त किसी अन्य न्यायाधीश की नियुक्ति करते समय राष्ट्रपति को मुख्य न्यायमूर्ति से हमेशा सलाह लेना होता है, और यदि वह उचित समझे तो अन्य वरिष्ठ न्यायाधीशों से भी सलाह ले सकता है।
सामान्यत: उच्चतम न्यायलय के वरिष्ठतम न्यायाधीश को ही भारत का मुख्य न्यायमूर्ति नियुक्त किया जाता है, किन्तु ऐसा करने के लिए कोई संवैधानिक बाध्यता नहीं है।
संविधान का अनुच्छेद 217 उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति का उपबंध करता है। इसके अनुसार किसी उच्च न्यायलय के किसी न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा भारत के मुख्य न्यायमूर्ति, उस उच्च न्यायलय से सम्बंधित राज्य के राज्यपाल और मुख्य न्यायमूर्ति से भिन्न किसी न्यायाधीश की नियुक्ति की दशा में उस उच्च न्यायलय के मुख्य न्यायमूर्ति से सलाह करने के बाद की जाएगी।
B. न्यायाधीशों की नियुक्ति की वर्तमान कोलेजियम व्यवस्था (Collegium of the Court):
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जब भी उच्चतम न्यायलय या किसी उच्च न्यायलय में न्यायाधीश का कोई पद खाली होता है तो उच्चतम न्यायलय का मुख्य न्यायमूर्ति और 4 अन्य वरिष्ठतम न्यायाधीश (अर्थात कुल 5) उस पद के लिए विभिन्न नामों पर विचार करते हैं और उस व्यक्ति के नाम की अनुशंसा करते है जिसे न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया जाना चाहिए। किसी न्यायाधीश का स्थानान्तरण (Transfer) करने के लिए भी यही व्यवस्था है।
न्यायाधीशों के चयन और स्थानान्तरण की इस व्ययस्था का संविधान में कोई प्रावधान नहीं है। यह व्यवस्था 1993 में उच्चतम न्यायलय की एक संविधान पीठ द्वारा दिए गए निर्णय और बाद में 1998 में दिए गए एक अन्य निर्णय पर आधारित है। यह व्यवस्था न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानान्तरण में सरकार के हस्तक्षेप को दूर करने के लिए की गयी थी, हालाँकि इस व्यवस्था की अपनी कुछ कमियाँ हैं।
इस प्रकार, हालाँकि संविधान के उपबंध के अनुसार न्यायाधीशों की नियुक्ति (appointment) करने का अधिकार तो अभी भी राष्ट्रपति को ही है, किन्तु ऐसा करते समय उसे उच्चतम न्यायालय के उपरोक्त निर्णयों को भी ध्यान में रखना पड़ता है जिससे न्यायाधीशों का चयन (selection) करने की वास्तविक शक्ति उच्चतम न्यायलय के न्यायाधीशों के एक समूह में स्थानांतरित हो गयी है जिसे "न्यायलय का कोलेजियेम" (Collegium of the Court) कहा जाता है।
अब कोलेजियम के द्वारा प्रस्तावित नामों को कानून मंत्रालय की औपचारिक अनुशंसा प्राप्त होने के बाद, राष्ट्रपति उन्हें नियुक्त करने की औपचारिकता मात्र ही पूरी करता है।
C. संविधान का 121वां संशोधन विधेयक एवं राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (National Judicial Appointment Commission - NJAC) का गठन:
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न्यायाधीशों की नियुक्ति एवं स्थानांतरण की कोलेजियम व्यवस्था में कमियों के कारण इस व्यवस्था की काफी आलोचना होती रही है, साथ ही चूँकि इस व्यवस्था में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए सिफारिश करने का कार्य केवल न्यायाधीशों के द्वारा ही किया जाता है इसलिए यह व्यवस्था न्यायपालिका में भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार को भी प्रोत्साहन देती है.
अत: इस व्यवस्था को बदलकर इसके स्थान पर एक अधिक पारदर्शी व्यवस्था स्थापित करने के उद्देश्य से संविधान में 121वें संशोधन विधेयक के द्वारा न्यायिक नियुक्त आयोग की स्था
सामान्य अध्ययन, [10.08.16 19:38]
पना का प्रस्ताव किया गया. चूँकि यह संशोधन संघ की न्यायपालिका के उपबंधों में परिवर्तन के लिए है, इसलिए इसे अनुच्छेद 368 में उपबंधित संविधान संशोधन की प्रक्रिया के तहत ही किया जा सकता था जिसमें आधे से ज्यादा राज्यों की सहमति भी जरूरी थी.
यह परिवर्तन करने के लिए 121वां संविधान (संशोधन) विधेयक, 2014 लोक सभा में 11 अगस्त 2014 को क़ानून एवं न्याय मंत्री श्री रविशंकर प्रसाद द्वारा प्रस्तुत किया गया था. तत्पश्चात संसद के दोनों सदनों द्वारा अगस्त 2014 में पारित किये जाने के बाद और इस पर आधे से ज्यादा राज्यों की सहमति (16 राज्यों ने इस पर सहमति दे दी है) मिलने के बाद इस विधेयक को 31 दिसंबर 2014 को राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त हो गयी और यह "संविधान (99वां) संशोधन अधिनियम, 2014" के रूप में भारत के राजपत्र में प्रकाशित किया गया.
यह विधेयक उच्चतम एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति के संबंध में राष्ट्रपति को सिफारिश करने के लिय संविधान में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (National Judicial Appointment Commission - NJAC) की स्थापना का उपबंध करता है. यह संशोधन विधेयक संविधान के उन उपबंधो में भी संशोधन करता है जो उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के स्थानान्तरण से संबंधित हैं.
राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) का संगठन या संरचना:
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संविधान में एक नया अनुच्छेद 124-A अंतर्विष्ट किया गया है जिसमें राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) के संगठन के बारे में उपबंध है. इसके अनुसार राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग की संरचना निम्नानुसार होगी -
1. भारत के मुख्य न्यायमूर्ति (अध्यक्ष)
2. उच्चतम न्यायलय के दो वरिष्ठतम न्यायाधीश
3. केंद्रीय क़ानून एवं न्याय मंत्री
4. दो प्रतिष्ठित व्यक्ति, जिन्हें मुख्य न्यायमूर्ति, प्रधानमंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता से मिलकर बनने वाली समिति द्वारा नामनिर्देशित किया जाएगा. इन दो व्यक्तियों में से एक व्यक्ति SC या ST या OBC या अल्पसंख्यक वर्ग से या महिला होना चाहिए. साथ ही, ये दोनों प्रतिष्ठित व्यक्ति तीन साल के लिए नामनिर्देशित किये जायेंगे और उसके बाद इनका पुन: नामनिर्देशन नहीं किया जा सकेगा.
राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) के कार्य:
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राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग के कार्यों के संबंध में संविधान में एक नया अनुच्छेद 124B अंतर्विष्ट किया गया है. इसके अनुसार इस आयोग के कार्य निम्नलिखित होंगे -
1. उच्चतम न्यायलय के मुख्य न्यायमूर्ति, उच्चतम न्यायलय के अन्य न्यायाधीशों, किसी उच्च न्यायलय के मुख्य न्यायमूर्ति और उच्च न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों के रूप में नियुक्त किये जाने के योग्य व्यक्तियों की सिफारिश करना,
2. विभिन्न उच्च न्यायलय के मुख्य न्यायमूर्ति एवं अन्य न्यायाधीशों के एक उच्च न्यायलय से अन्य उच्च न्यायलय में स्थानान्तरण के संबंध में सिफारिश करना, और
3. यह सुनिश्चित करना की जिन व्यक्तियों की सिफारिश की जा रही है, वे योग्य एवं ईमानदार हों.
नियुक्त की प्रक्रिया के संबंध में विधि बनाने की संसद की शक्ति:
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संविधान में नया अनुच्छेद 124C अंतर्विष्ट किया गया है जो संसद को निम्नलिखित के संबंध में विधि बनाने की शक्ति प्रदान करता है, अर्थात संसद -
1. न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित प्रक्रिया का विधि द्वारा विनियमन कर सकती है.
2. राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) को विधि द्वारा इस संबंध में शक्ति प्रदान कर सकेगी की वह अपनी कार्यविधि, नियुक्ति हेतु सिफारिश किये जाने के लिए व्यक्तियों के चयन की प्रक्रिया आदि को निर्धारित कर सके.
न्यायाधीशों की नियुक्ति की नयी प्रक्रिया एवं राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (National Judicial Appointment Commission - NJAC):
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A. वर्तमान संवैधानिक उपबंध:
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भारत के संविधान के भाग 5 में अध्याय 4 संघ की न्यायपालिका से सम्बन्धित है और भाग 6 के अध्याय 5 में राज्यों के उच्च न्यायालयों के संबंध में उपबंध हैं. संघ की न्यायपालिका (भाग 5 के अध्याय 4) में अनुच्छेद 124 से अनुच्छेद 147 तक उच्चतम न्यायलय से संबंधित उपबंध हैं. इसी प्रकार राज्यों की न्यायपालिका (भाग 6 के अध्याय 5) में अनुच्छेद 214 से अनुच्छेद 231 तक उच्च न्यायालयों से संबंधित उपबंध हैं.
इनमें से अनुच्छेद 124 में उच्चतम न्यायालय एवं अनुच्छेद 217 में उच्च न्यायालय के मुख्य एवं अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया का उल्लेख है.
अनुच्छेद 124(2) के अनुसार उच्चतम न्यायलय के मुख्य न्यायमूर्ति और अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। इस अनुच्छेद के अनुसार मुख्य न्यायमूर्ति की नियुक्ति करते समय राष्ट्रपति को उच्चतम न्यायालय के और राज्यों के उच्च न्यायालयों के ऐसे अन्य न्यायाधीशों से सलाह लेना होता है जिनसे सलाह लेना वह उचित समझता है। परन्तु मुख्य न्यायमूर्ति के अतिरिक्त किसी अन्य न्यायाधीश की नियुक्ति करते समय राष्ट्रपति को मुख्य न्यायमूर्ति से हमेशा सलाह लेना होता है, और यदि वह उचित समझे तो अन्य वरिष्ठ न्यायाधीशों से भी सलाह ले सकता है।
सामान्यत: उच्चतम न्यायलय के वरिष्ठतम न्यायाधीश को ही भारत का मुख्य न्यायमूर्ति नियुक्त किया जाता है, किन्तु ऐसा करने के लिए कोई संवैधानिक बाध्यता नहीं है।
संविधान का अनुच्छेद 217 उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति का उपबंध करता है। इसके अनुसार किसी उच्च न्यायलय के किसी न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा भारत के मुख्य न्यायमूर्ति, उस उच्च न्यायलय से सम्बंधित राज्य के राज्यपाल और मुख्य न्यायमूर्ति से भिन्न किसी न्यायाधीश की नियुक्ति की दशा में उस उच्च न्यायलय के मुख्य न्यायमूर्ति से सलाह करने के बाद की जाएगी।
B. न्यायाधीशों की नियुक्ति की वर्तमान कोलेजियम व्यवस्था (Collegium of the Court):
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जब भी उच्चतम न्यायलय या किसी उच्च न्यायलय में न्यायाधीश का कोई पद खाली होता है तो उच्चतम न्यायलय का मुख्य न्यायमूर्ति और 4 अन्य वरिष्ठतम न्यायाधीश (अर्थात कुल 5) उस पद के लिए विभिन्न नामों पर विचार करते हैं और उस व्यक्ति के नाम की अनुशंसा करते है जिसे न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया जाना चाहिए। किसी न्यायाधीश का स्थानान्तरण (Transfer) करने के लिए भी यही व्यवस्था है।
न्यायाधीशों के चयन और स्थानान्तरण की इस व्ययस्था का संविधान में कोई प्रावधान नहीं है। यह व्यवस्था 1993 में उच्चतम न्यायलय की एक संविधान पीठ द्वारा दिए गए निर्णय और बाद में 1998 में दिए गए एक अन्य निर्णय पर आधारित है। यह व्यवस्था न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानान्तरण में सरकार के हस्तक्षेप को दूर करने के लिए की गयी थी, हालाँकि इस व्यवस्था की अपनी कुछ कमियाँ हैं।
इस प्रकार, हालाँकि संविधान के उपबंध के अनुसार न्यायाधीशों की नियुक्ति (appointment) करने का अधिकार तो अभी भी राष्ट्रपति को ही है, किन्तु ऐसा करते समय उसे उच्चतम न्यायालय के उपरोक्त निर्णयों को भी ध्यान में रखना पड़ता है जिससे न्यायाधीशों का चयन (selection) करने की वास्तविक शक्ति उच्चतम न्यायलय के न्यायाधीशों के एक समूह में स्थानांतरित हो गयी है जिसे "न्यायलय का कोलेजियेम" (Collegium of the Court) कहा जाता है।
अब कोलेजियम के द्वारा प्रस्तावित नामों को कानून मंत्रालय की औपचारिक अनुशंसा प्राप्त होने के बाद, राष्ट्रपति उन्हें नियुक्त करने की औपचारिकता मात्र ही पूरी करता है।
C. संविधान का 121वां संशोधन विधेयक एवं राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (National Judicial Appointment Commission - NJAC) का गठन:
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न्यायाधीशों की नियुक्ति एवं स्थानांतरण की कोलेजियम व्यवस्था में कमियों के कारण इस व्यवस्था की काफी आलोचना होती रही है, साथ ही चूँकि इस व्यवस्था में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए सिफारिश करने का कार्य केवल न्यायाधीशों के द्वारा ही किया जाता है इसलिए यह व्यवस्था न्यायपालिका में भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार को भी प्रोत्साहन देती है.
अत: इस व्यवस्था को बदलकर इसके स्थान पर एक अधिक पारदर्शी व्यवस्था स्थापित करने के उद्देश्य से संविधान में 121वें संशोधन विधेयक के द्वारा न्यायिक नियुक्त आयोग की स्था
सामान्य अध्ययन, [10.08.16 19:38]
पना का प्रस्ताव किया गया. चूँकि यह संशोधन संघ की न्यायपालिका के उपबंधों में परिवर्तन के लिए है, इसलिए इसे अनुच्छेद 368 में उपबंधित संविधान संशोधन की प्रक्रिया के तहत ही किया जा सकता था जिसमें आधे से ज्यादा राज्यों की सहमति भी जरूरी थी.
यह परिवर्तन करने के लिए 121वां संविधान (संशोधन) विधेयक, 2014 लोक सभा में 11 अगस्त 2014 को क़ानून एवं न्याय मंत्री श्री रविशंकर प्रसाद द्वारा प्रस्तुत किया गया था. तत्पश्चात संसद के दोनों सदनों द्वारा अगस्त 2014 में पारित किये जाने के बाद और इस पर आधे से ज्यादा राज्यों की सहमति (16 राज्यों ने इस पर सहमति दे दी है) मिलने के बाद इस विधेयक को 31 दिसंबर 2014 को राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त हो गयी और यह "संविधान (99वां) संशोधन अधिनियम, 2014" के रूप में भारत के राजपत्र में प्रकाशित किया गया.
यह विधेयक उच्चतम एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति के संबंध में राष्ट्रपति को सिफारिश करने के लिय संविधान में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (National Judicial Appointment Commission - NJAC) की स्थापना का उपबंध करता है. यह संशोधन विधेयक संविधान के उन उपबंधो में भी संशोधन करता है जो उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के स्थानान्तरण से संबंधित हैं.
राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) का संगठन या संरचना:
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संविधान में एक नया अनुच्छेद 124-A अंतर्विष्ट किया गया है जिसमें राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) के संगठन के बारे में उपबंध है. इसके अनुसार राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग की संरचना निम्नानुसार होगी -
1. भारत के मुख्य न्यायमूर्ति (अध्यक्ष)
2. उच्चतम न्यायलय के दो वरिष्ठतम न्यायाधीश
3. केंद्रीय क़ानून एवं न्याय मंत्री
4. दो प्रतिष्ठित व्यक्ति, जिन्हें मुख्य न्यायमूर्ति, प्रधानमंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता से मिलकर बनने वाली समिति द्वारा नामनिर्देशित किया जाएगा. इन दो व्यक्तियों में से एक व्यक्ति SC या ST या OBC या अल्पसंख्यक वर्ग से या महिला होना चाहिए. साथ ही, ये दोनों प्रतिष्ठित व्यक्ति तीन साल के लिए नामनिर्देशित किये जायेंगे और उसके बाद इनका पुन: नामनिर्देशन नहीं किया जा सकेगा.
राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) के कार्य:
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राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग के कार्यों के संबंध में संविधान में एक नया अनुच्छेद 124B अंतर्विष्ट किया गया है. इसके अनुसार इस आयोग के कार्य निम्नलिखित होंगे -
1. उच्चतम न्यायलय के मुख्य न्यायमूर्ति, उच्चतम न्यायलय के अन्य न्यायाधीशों, किसी उच्च न्यायलय के मुख्य न्यायमूर्ति और उच्च न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों के रूप में नियुक्त किये जाने के योग्य व्यक्तियों की सिफारिश करना,
2. विभिन्न उच्च न्यायलय के मुख्य न्यायमूर्ति एवं अन्य न्यायाधीशों के एक उच्च न्यायलय से अन्य उच्च न्यायलय में स्थानान्तरण के संबंध में सिफारिश करना, और
3. यह सुनिश्चित करना की जिन व्यक्तियों की सिफारिश की जा रही है, वे योग्य एवं ईमानदार हों.
नियुक्त की प्रक्रिया के संबंध में विधि बनाने की संसद की शक्ति:
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संविधान में नया अनुच्छेद 124C अंतर्विष्ट किया गया है जो संसद को निम्नलिखित के संबंध में विधि बनाने की शक्ति प्रदान करता है, अर्थात संसद -
1. न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित प्रक्रिया का विधि द्वारा विनियमन कर सकती है.
2. राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) को विधि द्वारा इस संबंध में शक्ति प्रदान कर सकेगी की वह अपनी कार्यविधि, नियुक्ति हेतु सिफारिश किये जाने के लिए व्यक्तियों के चयन की प्रक्रिया आदि को निर्धारित कर सके.