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इरोम शर्मिला : राह नई, मंजिल वही

(एक नई राह पर चलने का इरोम शर्मिला का फैसला अफ्स्पा पर चल रही राजनीतिक बहस को आगे बढ़ाने का काम करेगा. द इंडियन एक्सप्रेस की संपादकीय टिप्पणी)
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16 साल पहले इरोम शर्मिला ने ऐलान किया था कि वे दोबारा तभी अन्न ग्रहण करेंगी जब मणिपुर से सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम (अफ्स्पा) हट जाएगा. मंगलवार को उन्होंने अपनी भूख हड़ताल खत्म कर दी है लेकिन राज्य के एक बड़े हिस्से में अफ्स्पा अब भी जारी है.


लेकिन शर्मिला के लिए यह लड़ाई में हार मिलने जैसा नहीं है. उन्होंने वादा किया है कि वे अफ्स्पा के खिलाफ एक नए मंच से अपनी लड़ाई जारी रखेंगी. यह नया मंच चुनावी लोकतंत्र का है. बीते सालों के दौरान उनके संघर्ष का दायरा सिर्फ अफ्स्पा तक सीमित रहा था लेकिन, मंगलवार को उन्होंने संकेत दिया कि वे इस दायरे का विस्तार करेंगी और बड़े सामाजिक और राजनीतिक बदलाव के मुद्दों को भी इसमें शामिल करेंगी. उन्होंने कश्मीर और मणिपुर में आत्मनिर्णय के अधिकार की बात की. इसके साथ ही उन्होंने यह भी साफ किया कि उनका इरादा उस राजनीतिक लोकतंत्र में दाखिल होना और उससे संवाद करना है जो भारतीय संविधान से उपजा है. उन्होंने कहा कि अगर राजनीति गंदी है तो समाज भी साफ नहीं है. इससे संकेत मिलता है कि राजनीतिक सक्रियता को लेकर वे एक व्यावहारिक नजरिया रखती हैं.

अपने फौलादी संकल्प के साथ शर्मिला राजनीतिक कार्रवाई के एक नए प्रतिमान की प्रतिनिधि बन चुकी हैं. उन्होंने सामूहिक विरोध प्रदर्शन के आम तरीकों से अलग राह पकड़ी. उनकी भूख हड़ताल अपने अधिकार वापस पाने के लिए एक ऐसे व्यक्ति का संघर्ष थी जिसकी शक्तियां राज्य और न्यायिक व्यवस्था ने छीन ली थीं. ताकतवर के खिलाफ कमजोर के नैतिक हथियार के रूप में गांधी ने सत्याग्रह की खोज की थी. भारतीय राज्य व्यवस्था, जो खुद को गांधी का उत्तराधिकारी कहती है, ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. उसने इस सत्याग्रह की उपेक्षा करने की कोशिश की. लेकिन शर्मिला के दृढ़संकल्प के चलते जब यह कोशिश विफल रही तो व्यवस्था ने उन्हें कानूनी मकड़जाल में उलझाने की कोशिश की. इसी व्यवस्था की प्रतिक्रिया तब बिल्कुल उलट थी जब अन्ना हजारे दिल्ली में अनशन पर बैठे थे.

राजनीतिक वर्ग के इस व्यवहार की कई वजहें हो सकती हैं. शायद ऐसा दिल्ली से मणिपुर के बहुत दूर होने की वजह से हुआ हो या इसलिए कि सुदूर सीमा पर बसे लोगों की चिंताएं हमारे लिए ज्यादा मायने नहीं रखतीं या फिर इसलिए कि शर्मिला ने सेना के व्यवहार की निंदा की थी.

लेकिन शर्मिला और मणिपुर की तमाम दूसरी महिलाओं को नागरिक समाज का साथ मिला. उनका निरंतर विरोध अफ्स्पा के लिए सबसे बड़ी चुनौती रहा है. इसने न सिर्फ इस कानून पर राष्ट्रव्यापी बहस छेड़ी है बल्कि इसकी वजह से इस मामले में न्यायपालिका का दखल भी मुमकिन हुआ है.
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Today's editorial in hindi....
10-08-2016
(THE INDIAN EXPRESS 📄

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